Adab Nama Short Stories Children's Stories 8Indian Languages Novel Diwane Ghalib Afsane

धरना
एम. मुबीन
सबसे
पहले
सेक्रेटरी
ने
उन्हें
इस
बात
की
खबर
दी
थी।
??आपने
आज
का
अखबार
पढा ???
??अभी
तो
जागा
हूँ
आफ
फोन
की
आवाज
से
तो
भला
अखबार
किस
तरह
पढ
सकता
हूँ ?
कहिए
क्या
कोई
खास
खबर
है ???
??हाँ,
सरकार
ने
उन
स्कूलों
की
लिस्ट
जारी
की
है
जिन्हें
सरकार
की
ओर
से
मान्यता
प्राप्त
नहीं
है।
उस
सूची
में
हमारी
स्कूल
का
भी
नाम
है।??
??आँ,
क्या
कह
रहे
हैं
आप ?
सरकार
ने
हमारी
स्कूल
को
मान्यता
नहीं
दी ?
तो
क्या
हमारी
इतनी
भागदौड,
पत्र-
व्यवहार
मंत्रियों,
नेताओं
से
मिलना-जुलना
सब
बेकार
गया*???
??सब
बेकार
गया
है
अध्यक्ष
जी !
मुझे
तो
पहले
ही
भय
था
ऐसा
ही
होगा
और
ऐसा
ही
हुआ ....
हमें
तो
पहले
ही
सूचना
मिल
गई
थी
इस
वर्ष
भी
सरकार
ने
हमारी
स्कूल
को
मान्यता
नहीं
दी
और
अब
तो
सारी
दुनिया
को
मालूम
पड
गया
है।
इस
बात
की
जानकारी
सबको
होते
ही
एक
तूफान
आ
जाएगा
अध्यक्ष
जी
तूफान .....।??
??हाँ,
सेक्रेटरी
साहब??
वे
चिन्तित
स्वर
में
बोले।
उस
तूफान
के
आगमन
को
मैं
भी
अनुभव
कर
रहा
हूँ.....।
और
उसके
बाद
तो
कई
फोन
आए।
लोगों
को
उत्तर
देते-देते
उनका
सिर
चकराने
लगा
था।
वे
इस
बात
से
ही
चिन्तित
हो
रहे
थे
कि
लोगों
को
फोन
पर
समझाना
कठिन
हो
रहा
है।
जब
उनका
सामना
होगा
तो
वे
किस
तरह
उन्हें
समझा
पाएँगे ?
??गुप्ता
जी,
आपने
जो
स्कूल
खोली
है
उसे
तो
अभी
तक
मान्यता
भी
नहीं
मिल
पाई
है।
उसमें
हमारे
बच्चे
पढ
रहे
हैं
यह
तो
उनकी
जीवन
से
बहुत
बडा
खिलवाड
है।??
??गुप्ता
जी
आपने
तो
मेरे
बच्चे
को
कहीं
का
नहीं
रखा।
आपकी
स्कूल
को
अभी
तक
मान्यता
नहीं
मिल
सकी
है
इसका
अर्थ
है
आपकी
स्कूल
से
निकलने
के
बाद
मेरे
बच्चे
को
कहीं
भी
दाखला
नहीं
मिल
सकेगा ???
??गुप्ता
जी,
स्कूल
खोलने
के
नाम
पर
आपने
जनता
से
लाखों
रुपया
जमा
किया
है।
पैसा
तो
आपने
जमा
कर
लिया
परन्तु
अपनी
स्कूल
को
मान्यता
नहीं
दिला
सके ???
वे
सारी
बातें
सुनने
के
बाद
एक
ही
उत्तर
देते।
??आपको
चिन्ता
करने
और
उत्तेजित
होने
की
कोई
जरूरत
नहीं।
यह
सब
सरकारी
दाँवपेच
और
अडचनें
हैं।
एक
मास
के
भीतर
हमारी
स्कूल
को
मान्यता
मिल
जाएगी।??
उन्होंने
बडे
विश्वास
से
सभी
को
उत्तर
दे
दिया
था
और
तय
भी
कर
लिया
था
कि
हर
किसी
को
वे
यही
उत्तर
देंगे
परन्तु
वे
अपने
विश्वास
के
खोखलेपन
के
बारे
में
सोच-सोचकर
स्वयं
ही
काँप
उठते
थे।
दो
वर्ष
से
तो
मान्यता
प्राप्त
करने
के
लिए
सारे
प्रयत्न
किये
जा
चुके
हैं।
कागजी
कार्यवाही
और
पत्र-व्यवहार
से
फाईलों
का
ढेर
तैयार
हो
चुका
है।
शिक्षा
विभाग
से
शिक्षा
मंत्रालय,
शिक्षा
मंत्रालय
से
सचिवालय
और
मुख्य
मंत्री
के
ऑफिसों
के
चक्कर
लगाते-लगाते
उनके
साथ-साथ
सेक्रेटरी,
कुछ
सदस्यों,
स्कूल
के
हेडमास्टर,
क्लर्क
और
शिक्षकों
की
चप्पलें
घिस
चुकी
हैं।
परन्तु
फिर
भी
मान्यता
नहीं
मिल
सकी।
तुरन्त
मान्यता
प्राप्त
करने
का
मार्ग
भी
बताया
गया
था।
कुछ
देकर
काम
निकाल
लिया
जाए,
परन्तु
माँग
इतनी
ज्यादा
थी
कि
उन्हें
और
पूरे
बोर्ड
को
सोचने
के
लिए
विवश
होना
पडा
था।
बात
ऐसी
भी
नहीं
थी
कि
माँग
का
प्रबन्ध
नहीं
हो
सकता
था
माँग
से
कई
गुना
अधिक
तो
उनके
पास
जमा
था।
परन्तु
वे
अपने
उसूल
पर
अड
गये।
??हम
लोगों
से,
दूसरों
से
सिर्फ
लेते
हैं।
भला
हम
क्यों
दूसरों
को
दें
और
फिर
हम
जो
कुछ
कर
रहे
हैं
इसमें
हमारे
व्यक्तिगत
स्वार्थ
तो
कुछ
भी
नहीं
हैं।
हम
यह
सब
जनता
के
लिए
कर
रहे
हैं
हम
यह
चाहते
हैं
कि
हमारी
स्कूल
में
बच्चे
पढकर
दुनिया
की
प्रतिस्पर्धा
में
टिकने
की
क्षमता
प्राप्त
करें
और
स्पर्धा
में
सफल
हों।??
इसके
लिए
उन्होंने
शिक्षा
के
स्तर
पर
बहुत
अधिक
ध्यान
दिया
था
और
यह
बात
तो
जनता
से
भी
मनवा
ली
थी
कि
उनकी
स्कूल
का
पढाई
का
स्तर
शहर
की
दूसरी
स्कूलों
के
स्तर
से
बहुत
ऊँचा
है।
शिक्षक
बहुत
मेहनत
करते
हैं।
तभी
तो
उनकी
स्कूल
में
दाखिला
लेने
के
लिए
बच्चों
के
अभिभावकों
की
कतारें
लग
गई
थीं
और
वे
इन्हीं
कतारों
का
तो
लाभ
उठाते
थे।
??देखिए,
आप
तो
अच्छी
तरह
जानते
हैं।
हमारी
स्कूल
की
शिक्षा
का
स्तर
कितना
ऊँचा
है।
परन्तु
क्या
करें
हमारी
स्कूल
को
कोई
सरकारी
ग्रांट
तो
मिलती
नहीं,
आप
लोगों
से
डोनेशन
फीस
और
जनता
से
स्कूल
चलाने
के
लिए
जो
चंदा
मिलता
है
उसी
से
यह
स्कूल
चलता
है।
इसलिए
आप
हमारी
विवशता
को
समझें।
हम
डोनेशन
के
नाम
पर
जो
माँग
रहे
हैं,
हमारी
वह
माँग
कोई
अनुचित
माँग
नहीं
है।
वह
हमारी
मजबूरी
है
इसलिए
हमारी
मजबूरी
को
समझते
हुए
और
अपने
बच्चों
के
उज्ज्वल
भविष्य
के
लिए
आप
ज्यादा
से
ज्यादा
रकम
दें
ताकि
हमें
स्कूल
चलाने
में
कोई
कठिनाई
ना
आए
और
आफ
बच्चे
का
भविष्य
बने।??
अपनी
विवशता
बताकर
और
लोगों
को
अपने
बच्चों
के
सुनहरे
भविष्य
का
सपना
दिखाकर
उन्होंने
दाखिलों
के
नाम
पर
ऊँची
डोनेशन
वसूल
की
थी।
जिस
का
कहीं
कोई
हिसाब-किताब
नहीं
था,
वे
लाखों
रुपये
उनकी
तिजोरी
में
जमा
थे
उनके
व्यापार
में
लगे
थे।
स्कूल
खोलने
के
लिए
चंदे
के
नाम
पर
भी
उन्होंने
लाखों
रुपये
जमा
किये
थे,
जिनसे
उनका
कारोबार
बढा
था
और
वे
आए
दिन
स्कूल
के
नाम
पर
धनपतियों
से
दान
के
रूप
में
लाखों
रुपये
जमा
करते
रहते
थे।
इस
क्रिया
में
कितना
रुपया
जमा
हुआ
और
कितना
खर्च
हो
गया,
कितना
बाकी
है ?
बाकी
है
भी
या
नहीं ?
इस
बारे
में
तो
स्कूल
के
सदस्यों
को
भी
पता
नहीं
था।
कुछ-कुछ
सेक्रेटरी
को
मालूम
था,
परन्तु
वह
तो
उनका
आदमी
था।
सब
तो
यही
जानते
थे
स्कूल
की
स्थापना
की
गई,
स्कूल
के
लिए
जमीन
खरीदी
गई,
उस
पर
स्कूल
के
लिए
जरूरी
इमारत
बनाई
गई।
स्कूल
शुरू
हुआ,
स्कूल
का
और
स्कूल
के
शिक्षकों
के
वेतन
का
खर्च
बढता
जा
रहा
है।
सब
वे
अदा
करते
हैं।
अब
इतने
पैसे
जमा
तो
नहीं
हो
सकते।
जरूर
गुप्ता
जी
अपनी
जेब
से
भी
लगाते
होंगे।
बडे
आदमी
हैं।
भगवान
ने
धन
के
साथ
दिल
भी
दिया
है
तभी
तो
दिल
खोलकर
स्कूल
में
पैसा
लगाते
हैं।
हमें
स्कूल
का
सदस्य
बना
लिया
यही
उनकी
महानता
है।
इस
सदस्यता
के
बदले
में
एक
पैसा
भी
तो
नहीं
लिया।
ना
अब
माँगते
हैं।
लोग
ऐसे
पदों
को
प्राप्त
करने
के
लिए
लाखों
रुपये
खर्च
कर
डालते
हैं।
फिर
भी
यह
पद
नहीं
मिल
पाता
है
परन्तु
हमें
तो
गुप्ता
जी
ने
मुफ्त
में
दे
दिया
बडे
दिलवाले
हैं .......।
सदस्य
अब
तक
शायद
उनके
बारे
में
यही
सोचते
हों
परन्तु
अब
जब
उन्हें
पता
लगेगा
कि
अभी
तक
स्कूल
को
मान्यता
नहीं
मिल
सकी
है
तो
वे
जरूर
पूछेंगे।
??गुप्ता
जी,
स्कूल
को
अभी
तक
मान्यता
क्यों
नहीं
मिल
सकी ???
उन्हें
समझाना
कौनसी
बडी
बात
है,
वे
सिर
झटक
कर
बडबडाए।
कह
दूँगा
कि ??मंत्री
मान्यता
देने
के
दस
लाख
रुपये
माँगते
हैं।
स्कूल
सदस्य
के
नाते
आप
लोग
एक-एक
लाख
दीजिए
स्कूल
को
मान्यता
मिल
जाएगी।??
यह
सुनते
ही
सब
ठंडे
हो
जाएँगे।
सदस्य
मण्डल
में
ऐसे-ऐसे
कंजूस
जमा
किए
हैं
कि
सिगरेट
के
लिए
एक
रुपया
खर्च
करने
से
भी
डरते
हैं।
एक
लाख
चंदे
की
बात
सुनकर
साँप
सूँघ
जाएगा।
इसके
बाद
साफ
कह
दूँगा
आप
लोग
इतना
नहीं
कर
सकते
और
फिर
भी
सदस्य
बने
रहना
चाहते
हैं
तो
स्कूल
में
क्या
हो
रहा
है
उस
पर
ध्यान
ना
दें,
मैं
हर
बात
संभालने
के
लिए
हूँ....
इसके
बाद
तो
सबकी
बोलती
ही
बंद
हो
जाएगी।
स्कूल
गए
तो
स्कूल
में
बच्चों
के
घर
वालों
का
ताँता
लगा
हुआ
था।
सबका
एक
ही
सवाल
था ??आफ
स्कूल
को
अभी
तक
मान्यता
नहीं
मिल
सकी
है।
इस
तरह
तो
आफ
स्कूल
में
पढकर
हमारे
बच्चे
की
जन्दगी
बर्बाद
हो
जाएगी।
वह
कहीं
का
नहीं
रहेगा.....
इस
तरह
हमारे
बच्चे
के
जीवन
से
तो
ना
खेलें।??
उनका
एक
ही
उत्तर
होता --
??आप
निश्चिंत
रहिए,
हमारी
स्कूल
को
एक
मास
के
भीतर
मान्यता
मिल
जाएगी।??
बच्चों
के
घर
वालों
से
छुटकारा
मिला
तो
हेडमास्टर
और
टीचरों
ने
घेर
लिया।
??सर,
हम
इस
आशा
में
कम
वेतन
में
भी
कडी
मेहनत
से
बच्चों
को
पढा
रहे
हैं
कि
ग्रांट
मिलने
के
बाद
हमें
अच्छा
वेतन
मिलने
लगेगा,
परन्तु
यहाँ
तो
स्कूल
की
ग्रांट
की
बात
तो
दूर
स्कूल
को
अभी
मान्यता
तक
नहीं
मिल
सकी
है।??
??सब
ठीक
हो
जाएगा
आप
लोग
अपने-अपने
क्लास
में
जाइये।??
उसके
बाद
उन्होंने
सेक्रेटरी,
क्लर्क,
हेडमास्टर
को
आदेश
दिया।
बीडीओ,
जेडपी,
शिक्षा
सभापति,
शिक्षा
विभाग,
शिक्षा
मंत्रालय,
शिक्षा
मंत्री
सब
जगह
एक
कडा
पत्र
भेजिए।
यदि
एक
महिने
के
भीतर
हमारी
स्कूल
को
मान्यता
नहीं
दी
गई
तो
स्कूल
के
सदस्य,
हेडमास्टर,
शिक्षक,
स्कूल
में
पढने
वाले
बच्चे
और
उनके
घर
वाले
मंत्रालय
के
सामने
भूख
हडताल
कर
देंगे....देखिए
इस
पत्र
से
हलचल
मच
जाएगी
और
एक
मास
से
पहले
ही
हमारे
हाथों
में
स्कूल
की
मान्यता
का
पत्र
आ
जाएगा।
उनकी
बात
सुनकर
हर
किसी
की
आँख
में
आशा
की
एक
नई
ज्योत
जगमगाने
लगी।
वह
धमकी
भी
कारगर
साबित
नहीं
हो
सकी
थी।
कुछ
जगहों
से
तो
धमकी
का
कोई
उत्तर
ही
नहीं
आया
था।
कुछ
जगहों
से
टका-सा
जवाब
आया
था, ??नियमों
के
अनुसार
आपकी
स्कूल
को
मान्यता
नहीं
दी
जा
सकती।??
सबकी
आँखों
के
सामने
अंधेरा
छाया
था।
??ठीक
है??
पता
नहीं
क्यों
फिर
भी
उनकी
आवाज
में
आत्मविश्वास
था।
२०
तारीख
को
यहाँ
से
मंत्रालय
तक
एक
मोर्चे
का
प्रबन्ध
किया
जाए।
२०
तारीख
को
दिन
भर
पूरी
मैनेजिंग
बॉडी,
हेडमास्टर,
स्कूल
शिक्षक,
तमाम
बच्चे
और
जो
आने
के
लिए
तैयार
हों
ऐसे
बच्चों
के
माँ-बाप
को
मंत्रालय
के
सामने
धरना
देना
है
और
मान्यता
ना
मिलने
तक
भूख
हडताल
करनी
है।??
??जी??
सबने
एक
स्वर
में
उत्तर
दिया।
२०
तारीख
को
दो
गाडयों
में
२००
के
लगभग
बच्चों
को
ठूँसकर
भरा
गया।
जगह
इतनी
तंग
थी
कि
बच्चे
ना
खडे
हो
सकते
थे
ना
बैठ
सकते
थे।
उन्हें
साँस
लेना
कठिन
हो
रहा
था,
दम
घुट
रहा
था
परन्तु
वे
मुँह
से
कोई
फरियाद
नहीं
कर
सकते
थे।
फरियाद
सुनने
वाला
कोई
नहीं
था।
एक
बडी-सी
गाडी
में
स्कूल
की
सदस्य
समिति
के
लोग
थे।
एक
दूसरी
छोटी
गाडी
में
हेडमास्टर
और
शिक्षक।
केवल
कुछ
ही
बच्चों
के
घरवाले
आ
पाए
थे
उन्हें
सीधे
मोर्चे
के
स्थान
पर
आने
के
लिए
कहा
गया
था।
दो
घंटे
बाद
गाडयाँ
आजाद
मैदान
में
जाकर
रुकी।
बच्चे
गाडयों
से
उतरे
तो
उन्हें
ऐसा
अनुभव
हुआ
जैसे
नरक
की
यात्रा
से
उन्हें
मुक्ति
मिल
गई
है।
सूरज
सर
पर
चढ
आया
था
और
आसमान
से
आग
बरसा
रहा
था।
मोर्चे
की
तैयारी
की
जाने
लगी।
बच्चों
के
हाथ
तख्तियाँ,
बैनर
देकर
उन्हें
नारे
याद
कराए
जाने
लगे।
और
जरूरी
निर्देश
दिए
जाने
लगे।
??सर
पानी !
बहुत
प्यास
लगी
है??
कोई
बच्चा
बोला
तो
उसकी
आवाज
में
सैकडों
स्वर
शामिल
हो
गए।
??अब
यहाँ
पानी
कहाँ
से
मिलेगा।
हम
तो
भूख
हडताल
करने
आए
हैं।
पीने-खाने
के
लिए
नहीं??
एक
टीचर
ने
उन्हें
डाँटा
तो
बच्चे
अपने
फटे
हुए
होठों
पर
जीभ
फेरकर
रह
गए।
प्यास
से
कंठ
में
काँटे
पडे
थे।
गले
से
आवाज
नहीं
निकल
रही
थी।
ऊपर
सिर
पर
सूरज
आग
बरसा
रहा
था।
परन्तु
फिर
भी
वे
पूरी
ताकत
लगाकर
नारे
लगाते-लडखडाते
कदमों
से
आगे
बढ
रहे
थे।
??हमारी
मांगे
पूरी
करो??।
??हमारी
स्कूल
को
मान्यता
दो।??
??हमारे
जीवन
से
मत
खेलो।??
??शिक्षा
मंत्री .............??।
??शिक्षा
विभाग ..........................??।
??मुख्यमंत्री
.............??।
शिक्षक
बच्चों
पर
नजर
रखे
हुए
थे।
उन्हें
जोर-जोर
से
नारे
लगाने
के
लिए
उकसाने
पर
कोई
नारे
नहीं
लगाता
तो
उसे
टोकते।
आपस
में
बातें
करने
वाले
को
डाँटते।
उन्हें
कतार
से
यातायात
से
बचकर
चलने
के
निर्देश
देते।
कमेटी
के
सदस्य
मोर्चे
के
साथ
एक
दूसरे
से
ठट्टा,
मसखरी,
हँसी
मजाक
करते
चल
रहे
थे।
कभी
कोई
सबके
लिए
आइसक्रीम
या
शर्बत
ले
आता
या
ठंडे
की
बोतलें
या
फिर
खाने
की
कोई
चीज
तो
उनका
आनन्द
लेते,
वे
मोर्चे
के
साथ
साथ
चलते।
दो
घंटे
बाद
मोर्चा
मंत्रालय
पहुँच
गया।
मंत्रालय
से
पहले
ही
बडे
से
मैदान
में
पुलिस
ने
उन्हें
रोक
लिया।
मैदान
में
सब
धरना
देकर
बैठ
गए।
आगे-आगे
कमेटी
के
सदस्य,
गुप्ता
जी
और
सेक्रेटरी
थे।
पीछे
हेडमास्टर
और
शिक्षक
और
उनके
पीछे
बच्चे।
सब
जोर-जोर
से
नारे
लगा
रहे
थे।
सभी
को
कडा
निर्देश
था
कि
वे
इतनी
जोर
से
चीखें
कि
मंत्रालय
की
छतें
हिल
जाएँ।
परन्तु
दस
करोड
जनता
की
चीजों
से
जिनका
कुछ
नहीं
बिगडता
था
दो
सौ
बच्चों
के
नारे
भला
उन
छतों
का
क्या
बिगाड
सकते
थे।
किसी
मंत्री
की
गाडी
आती
तो ?जिंदाबाद-मुर्दाबाद?
के
नारे
और
जोर-जोर
से
लगाए
जाते।
भूख
प्यास
से
बच्चों
का
बुरा
हाल
था।
ऊपर
से
तपती
धूप
जिस
जमीन
पर
बैठे
थे
वह
भी
तंदूर
की
तरह
तप
रही
थी।
बच्चों
की
आँखों
के
सामने
अंधेरा
छा
रहा
था।
अचानक
एक
बच्चा
चकराकर
गिर
पडा।
सब
उसकी
ओर
दौडे।
उसे
होश
में
लाने
की
कोशिश
की
जाने
लगी।
मगर
बच्चा
आँखें
नहीं
खोलता
था।
समीप
खडे
डॉक्टर
ने
बच्चे
को
अच्छी
तरह
देखा
और
चिन्ता
भरे
स्वर
में
बोला - ??बच्चे
की
हालत
बहुत
नाजुक
है,
इसे
तुरन्त
अस्पताल
पहुँचाना
जरूरी
है।??
??नहीं??
गुप्ता
जी
डट
गए। ??चाहे
बच्चे
की
जान
चली
जाए
बच्चा
धरने
से
नहीं
हटेगा।
जब
तक
हमारी
माँग
नहीं
पूरी
होगी
कोई
भी
बच्चा
नहीं
उठेगा??।
इस
बीच
दो
और
बच्चे
चकराकर
गिर
गए
थे।
कई
बच्चों
ने
भूख-प्यास
निर्बलता
से
गर्दन
अपने
साथियों
के
काँधे
पर
डाल
दी
थी।
कुछ
निर्बलता,
कमजोरी
के
कारण
जमीन
पर
लेट
गए
थे।
डॉक्टर
और
वहाँ
पहरा
देने
वाली
पुलिस
के
चेहरों
पर
हवाइयाँ
उड
रही
थीं।
गुप्ता
जी
और
सदस्यों
के
चेहरे
पर
विजयी
मुस्कान
नाच
रही
थी।
खबरें
मंत्रालय
में
पहुँची
और
वही
हुआ,
जो
ऐसे
मौकों
पर
होता
है।
मंत्रालय
हिलने
लगा।
??एकाध
बच्चा
मर
गया
तो
विपक्ष
और
प्रेस
सारा
आसमान
सिर
पर
उठा
लेगा।
हमारी
जान
का
दुश्मन
हो
जाएगा।
उन्हें
कह
दो
कि
वे
धरना
खत्म
करके
वापस
अपने
शहर
चले
जाए।
उनकी
मान्यता
के
बारे
में
गंभीरता
से
विचार
किया
जाएगा??।
एक
सेक्रेटरी
बोला।
??सर
वे
मान्यता
से
किसी
भी
कम
आश्वासन
पर
बात
करने
को
तैयार
नहीं
हैं।
साफ
कहते
हैं
उनकी
स्कूल
को
मान्यता
दी
जाएगी
तभी
धरने
से
उठेंगे।??
इस
बीच
चार
और
बच्चों
के
बेहोश
होने
की
खबर
पहुँची।
शिक्षा
मंत्री
के
सारे
सचिव
घबरा
गए।
मुख्यमंत्री
के
सचिव
के
भी
कान
खडे
हो
गए।
बात
मुख्यमंत्री
तक
पहुँच
गई।
??तमाशा
बनाकर
बात
मत
बढाओ।
शिक्षामंत्री
से
तुरन्त
कहो
कि
मैंने
कहा
है
उनकी
स्कूल
को
मान्यता
दे
दें।??
नीचे
आकर
गुप्ता
जी
को
यह
खबर
दे
दी
गई।
??शिक्षामंत्री
ने
आफ
स्कूल
को
मान्यता
दे
दी
है
और
वे
आपसे
बात
करना
चाहते
हैं।??
गुप्ता
जी
का
चेहरा
गुलाब
की
तरह
खिल
उठा
था।
??मेरे
प्यारे
साथियों
और
बच्च,
हमारा
धरना
सफल
रहा।
जिस
काम
के
लिए
हमने
धरना
दिया
था,
मोर्चा
निकाला
था
वह
काम
हो
गया
है।
शिक्षामंत्री
ने
हमारे
स्कूल
को
मान्यता
दी
है।
इस
धरने
में
हमें
जो
कष्ट
हुए
वे
रंग
लाए।
कुछ
पाने
के
लिए
कुछ
खोना
और
सहना
पडता
है।
अपने
अधिकार
की
लडाई
लडने
और
उन्हें
प्राप्त
करने
में
थोडी
तकलीफ
तो
होती
ही
है।
आप
लोग
धरना
खत्म
करके
वापस
अपने
शहर
जाएं,
मैं
और
कमेटी
सदस्य
मंत्री
जी
से
बात
करके
आते
हैं.........।??
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